Category: Mirza Ghalib

  • मिर्ज़ा ग़ालिब का जीवन और विरासत एक व्यापक परिचय

    मिर्ज़ा ग़ालिब का जीवन और विरासत एक व्यापक परिचय

    मिर्ज़ा ग़ालिब का जीवन और विरासत: एक व्यापक परिचय मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू और फ़ारसी साहित्य के सबसे महान शायरों में से एक थे। उनकी शायरी में गहरी भावनाएँ, जीवन के दर्शन और प्रेम की पेचीदगियाँ झलकती हैं। वे मुग़ल साम्राज्य के अंतिम वर्षों और ब्रिटिश शासन के शुरुआती दौर के गवाह रहे। उनकी रचनाएँ प्रेम, दर्द, संघर्ष और जीवन की सच्चाइयों को बखूबी बयां करती हैं।

    इस लेख में हम मिर्ज़ा ग़ालिब के जीवन, साहित्यिक योगदान और उनकी कालजयी शायरी पर विस्तृत चर्चा करेंगे।

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  • सीमाब-पुश्त गर्मी-ए-आईना दे है हम | Mirza Ghalib

    सीमाब-पुश्त गर्मी-ए-आईना दे है हम | Mirza Ghalib

    सीमाब-पुश्त गर्मी-ए-आईना दे है हम | Mirza Ghalib

    सीमाब-पुश्त गर्मी-ए-आईना दे है हम

    हैराँ किए हुए हैं दिल-ए-बे-क़रार के

    आग़ोश-ए-गुल कुशूदा बरा-ए-विदा है

    अंदलीब चल कि चले दिन बहार के

    यूँ बाद-ए-ज़ब्त-ए-अश्क फिरूँ गिर्द यार के

    पानी पिए किसू पे कोई जैसे वार के

    बाद-अज़-विदा-ए-यार ब-ख़ूँ दर तपीदा हैं

    नक़्श-ए-क़दम हैं हम कफ़-ए-पा-ए-निगार के

    हम मश्क़-ए-फ़िक्र-ए-वस्ल-ओ-ग़म-ए-हिज्र से ‘असद’

    लाएक़ नहीं रहे हैं ग़म-ए-रोज़गार के

    सीमाब-पुश्त गर्मी-ए-आईना दे है हम | Mirza Ghalib

  • kisi ko de ke dil koi nawa-sanj-e-fughan kyun ho | Mirza Ghalib

    kisi ko de ke dil koi nawa-sanj-e-fughan kyun ho | Mirza Ghalib

    kisi ko de ke dil koi nawa-sanj-e-fughan kyun ho | Mirza Ghalib

    kisī ko de ke dil koī navā-sanj-e-fuġhāñ kyuuñ ho

    na ho jab dil siine meñ to phir muñh meñ zabāñ kyuuñ ho

     

    vo apnī ḳhū na chhoḌeñge ham apnī vaz.a kyuuñ chhoḌeñ

    subuk-sar ban ke kyā pūchheñ ki ham se sargirāñ kyuuñ ho

     

    kiyā ġham-ḳhvār ne rusvā lage aag is mohabbat ko

    na laave taab jo ġham vo merā rāz-dāñ kyuuñ ho

     

    vafā kaisī kahāñ ishq jab sar phoḌnā Thahrā

    to phir ai sang-dil terā sañg-e-āstāñ kyuuñ ho

     

    qafas meñ mujh se rūdād-e-chaman kahte na Dar hamdam

    girī hai jis pe kal bijlī vo merā āshiyāñ kyuuñ ho

     

    ye kah sakte ho ham dil meñ nahīñ haiñ par ye batlāo

    ki jab dil meñ tumhīñ tum ho to āñkhoñ se nihāñ kyuuñ ho

     

    ġhalat hai jazb-e-dil shikva dekho jurm kis hai

    na khīñcho gar tum apne ko kashākash darmiyāñ kyuuñ ho

     

    ye fitna aadmī ḳhāna-vīrānī ko kyā kam hai

    hue tum dost jis ke dushman us āsmāñ kyuuñ ho

     

    yahī hai āzmānā to satānā kis ko kahte haiñ

    adū ke ho liye jab tum to merā imtihāñ kyuuñ ho

    kahā tum ne ki kyuuñ ho ġhair ke milne meñ rusvā.ī

    bajā kahte ho sach kahte ho phir kahiyo ki haañ kyuuñ ho

     

    nikālā chāhtā hai kaam kyā ta.anoñ se ‘ġhālib’

    tire be-mehr kahne se vo tujh par mehrbāñ kyuuñ ho

    kisi ko de ke dil koi nawa-sanj-e-fughan kyun ho | Mirza Ghalib

  • रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की | मिर्ज़ा ग़ालिब

    रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की | मिर्ज़ा ग़ालिब

    रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की | मिर्ज़ा ग़ालिब

    रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की

    इतराए क्यूँ ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की

    जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह

    लोगों में क्यूँ नुमूद हो लाला-ज़ार की

    भूके नहीं हैं सैर-ए-गुलिस्ताँ के हम वले

    क्यूँकर खाइए कि हवा है बहार की

    रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • काबे में जा रहा तो न दो ता’ना क्या कहें | मिर्ज़ा ग़ालिब

    काबे में जा रहा तो न दो ता’ना क्या कहें | मिर्ज़ा ग़ालिब

    काबे में जा रहा तो न दो ता’ना क्या कहें | मिर्ज़ा ग़ालिब

    काबे में जा रहा तो दो ता’ना क्या कहें

    भूला हूँ हक़्क़-ए-सोहबत-ए-अहल-ए-कुनिश्त को

    ताअ’त में ता रहे मय-ओ-अंगबीं की लाग

    दोज़ख़ में डाल दो कोई ले कर बहिश्त को

    हूँ मुन्हरिफ़ क्यूँ रह-ओ-रस्म-ए-सवाब से

    टेढ़ा लगा है क़त क़लम-ए-सरनविश्त को

    ‘ग़ालिब’ कुछ अपनी सई से लहना नहीं मुझे

    ख़िर्मन जले अगर मलख़ खाए किश्त को

    काबे में जा रहा तो न दो ता’ना क्या कहें | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • फिर इस अंदाज़ से बहार आई | मिर्ज़ा ग़ालिब

    फिर इस अंदाज़ से बहार आई | मिर्ज़ा ग़ालिब

    फिर इस अंदाज़ से बहार आई | मिर्ज़ा ग़ालिब

    फिर इस अंदाज़ से बहार आई

    कि हुए मेहर-ओ-मह तमाशाई

    देखो साकिनान-ए-ख़ित्ता-ए-ख़ाक

    इस को कहते हैं आलम-आराई

    कि ज़मीं हो गई है सर-ता-सर

    रू-कश-ए-सतह-ए-चर्ख़-ए-मीनाई

    सब्ज़ा को जब कहीं जगह मिली

    बन गया रू-ए-आब पर काई

    सब्ज़ा गुल के देखने के लिए

    चश्म-ए-नर्गिस को दी है बीनाई

    है हवा में शराब की तासीर

    बादा-नोशी है बादा-पैमाई

    क्यूँ दुनिया को हो ख़ुशी ‘ग़ालिब’

    शाह-ए-दीं-दार ने शिफ़ा पाई

    फिर इस अंदाज़ से बहार आई | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • नहीं कि मुझ को क़यामत का ए’तिक़ाद नहीं | मिर्ज़ा ग़ालिब

    नहीं कि मुझ को क़यामत का ए’तिक़ाद नहीं | मिर्ज़ा ग़ालिब

    नहीं कि मुझ को क़यामत का ए’तिक़ाद नहीं | मिर्ज़ा ग़ालिब

    नहीं कि मुझ को क़यामत का ए’तिक़ाद नहीं

    शब-ए-फ़िराक़ से रोज़-ए-जज़ा ज़ियाद नहीं

    कोई कहे कि शब-ए-मह में क्या बुराई है

    बला से आज अगर दिन को अब्र बाद नहीं

    जो आऊँ सामने उन के तो मर्हबा कहें

    जो जाऊँ वाँ से कहीं को तो ख़ैर-बाद नहीं

    कभी जो याद भी आता हूँ मैं तो कहते हैं

    कि आज बज़्म में कुछ फ़ित्ना-ओ-फ़साद नहीं

    अलावा ईद के मिलती है और दिन भी शराब

    गदा-ए-कूच-ए-मय-ख़ाना ना-मुराद नहीं

    जहाँ में हो ग़म-ओ-शादी बहम हमें क्या काम

    दिया है हम को ख़ुदा ने वो दिल कि शाद नहीं

    तुम उन के वा’दे का ज़िक्र उन से क्यूँ करो ‘ग़ालिब’

    ये क्या कि तुम कहो और वो कहें कि याद नहीं

     

    नहीं कि मुझ को क़यामत का ए’तिक़ाद नहीं | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • बहुत सही ग़म-ए-गीती शराब कम क्या है | मिर्ज़ा ग़ालिब

    बहुत सही ग़म-ए-गीती शराब कम क्या है | मिर्ज़ा ग़ालिब

    बहुत सही ग़म-ए-गीती शराब कम क्या है | मिर्ज़ा ग़ालिब

    बहुत सही ग़म-ए-गीती शराब कम क्या है

    ग़ुलाम-ए-साक़ी-ए-कौसर हूँ मुझ को ग़म क्या है

    तुम्हारी तर्ज़-ओ-रविश जानते हैं हम क्या है

    रक़ीब पर है अगर लुत्फ़ तो सितम क्या है

    सुख़न में ख़ामा-ए-ग़ालिब की आतिश-अफ़्शानी

    यक़ीं है हम को भी लेकिन अब उस में दम क्या है

    कटे तो शब कहें काटे तो साँप कहलावे

    कोई बताओ कि वो ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म क्या है

    लिखा करे कोई अहकाम-ए-ताला-ए-मौलूद

    किसे ख़बर है कि वाँ जुम्बिश-ए-क़लम क्या है

    हश्र-ओ-नश्र का क़ाएल केश मिल्लत का

    ख़ुदा के वास्ते ऐसे की फिर क़सम क्या है

    वो दाद-ओ-दीद गराँ-माया शर्त है हमदम

    वगर्ना मेहर-ए-सुलेमान-ओ-जाम-ए-जम क्या है

    बहुत सही ग़म-ए-गीती शराब कम क्या है | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़ | मिर्ज़ा ग़ालिब

    क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़ | मिर्ज़ा ग़ालिब

    क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़ | मिर्ज़ा ग़ालिब

    क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़

    क्या नहीं है मुझे ईमान अज़ीज़

     

    दिल से निकला पे निकला दिल से

    है तिरे तीर का पैकान अज़ीज़

     

    ताब लाए ही बनेगी ‘ग़ालिब’

    वाक़िआ सख़्त है और जान अज़ीज़

    क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़ | मिर्ज़ा ग़ालिब

    AahaT sī koī aa.e to lagtā hai ki tum ho

  • aah ko chahiye ik umr asar hote tak

    aah ko chahiye ik umr asar hote tak

    aah ko chāhiye ik umr asar hote tak

    kaun jiitā hai tirī zulf ke sar hote tak

    dām-e-har-mauj meñ hai halqa-e-sad-kām-e-nahañg

    dekheñ kyā guzre hai qatre pe guhar hote tak

    āshiqī sabr-talab aur tamannā betāb

    dil kā kyā rañg karūñ ḳhūn-e-jigar hote tak

    tā-qayāmat shab-e-furqat meñ guzar jā.egī umr

    saat din ham pe bhī bhārī haiñ sahar hote tak

    Aah Ko Chahiye ik umr asar hote tak

    ham ne maanā ki taġhāful na karoge lekin

    ḳhaak ho jā.eñge ham tum ko ḳhabar hote tak

    partav-e-ḳhur se hai shabnam ko fanā kī ta.alīm

    maiñ bhī huuñ ek ināyat kī nazar hote tak

    yak nazar besh nahīñ fursat-e-hastī ġhāfil

    garmī-e-bazm hai ik raqs-e-sharar hote tak

    ġham-e-hastī kā ‘asad’ kis se ho juz marg ilaaj

    sham.a har rañg meñ jaltī hai sahar hote tak

    aah ko chāhiye ik umr asar hote tak

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