Author: admin

  • कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यूँ है वो जो अपना था वही और किसी का क्यूँ है .

    कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यूँ है
    वो जो अपना था वही और किसी का क्यूँ है .

    कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यूँ है
    वो जो अपना था वही और किसी का क्यूँ है .

    यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यूँ है
    यही होता है तो आख़िर यही होता क्यूँ है

    इक ज़रा हाथ बढ़ा दें तो पकड़ लें दामन
    उन के सीने में समा जाए हमारी धड़कन

    इतनी क़ुर्बत है तो फिर फ़ासला इतना क्यूँ है
    दिल-ए-बर्बाद से निकला नहीं अब तक कोई

    इस लुटे घर पे दिया करता है दस्तक कोई
    आस जो टूट गई फिर से बंधाता क्यूँ है

    तुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता
    कहते हैं प्यार का रिश्ता है जनम का रिश्ता
    है जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यूँ है

  • कोई जाता है यहाँ से न कोई आता है,ये दीया अपने ही अँधेरे में घुट जाता है।

    कोई जाता है यहाँ से न कोई आता है,
    ये दीया अपने ही अँधेरे में घुट जाता है।

    कोई जाता है यहाँ से न कोई आता है,
    ये दीया अपने ही अँधेरे में घुट जाता है।

    सब समझते हैं वही रात की किस्मत होगा,
    जो सितारा बुलंदी पर नजर आता है।

    मैं इसी खोज में बढ़ता ही चला जाता हूँ,
    किसका आँचल है जो पर्बतों पर लहराता है।

    मेरी आँखों में एक बादल का टुकड़ा शायद,
    कोई मौसम हो सरे-शाम बरस जाता है।

    दे तसल्ली कोई तो आँख छलक उठती है,
    कोई समझाए तो दिल और भी भर आता है।

  • इंतहा आज इश्क़ की कर दीआपके नाम ज़िन्दगी कर दी

    इंतहा आज इश्क़ की कर दी
    आपके नाम ज़िन्दगी कर दी

    इंतहा आज इश्क़ की कर दी
    आपके नाम ज़िन्दगी कर दी

    था अँधेरा ग़रीब ख़ाने में
    आपने आ के रौशनी कर दी

    देने वाले ने उनको हुस्न दिया
    और अता मुझको आशिक़ी कर दी

    तुमने ज़ुल्फ़ों को रुख़ पे बिखरा कर
    शाम रंगीन और भी कर दी

  • आते-आते मेरा नाम सा रह गयाउस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया

    आते-आते मेरा नाम सा रह गया
    उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया

    आते-आते मेरा नाम सा रह गया
    उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया

    वो मेरे सामने ही गया और मैं
    रास्ते की तरह देखता रह गया

    झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये
    और मैं था कि सच बोलता रह गया

    आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे
    ये दिया कैसे जलता रह गया

  • अपने साये को इतना समझा देमुझे मेरे हिस्से की धूप आने दे

    अपने साये को इतना समझा दे
    मुझे मेरे हिस्से की धूप आने दे

    अपने साये को इतना समझा दे
    मुझे मेरे हिस्से की धूप आने दे

    एक् नज़र में कई ज़माने देखे तू
    बूढ़ी आंखो की तस्वीर बनाने दे

    बाबा दुनिया जीत के मैं दिखा दूँगा
    अपनी नज़र से दूर तो मुझ को जाने दे

    मैं भी तो इस बाग़ का एक् परिंदा हूं
    मेरी ही आवाज़ मैं मुझ को गाने दे

    फिर तो ये उँचा ही होता जायेगा
    बचपन के हाथो में चाँद आ जाने दे

  • हर ख़ुशी में कोई कमी सी हैहंसती आँखों में भी नमी सी है

    हर ख़ुशी में कोई कमी सी है
    हंसती आँखों में भी नमी सी है

    हर ख़ुशी में कोई कमी सी है
    हंसती आँखों में भी नमी सी है

    दिन भी चुपचाप सर झुकाये था
    रात की नब्ज़ भी थमी सी है

    ख्वाब था या गुबार था कोई
    गर्द इन पलकों पे जमी सी है

    कह गए हम ये किस से दिल की बात
    शहर में एक सनसनी सी है

    हसरतें राख हो गई लेकिन
    राख़ अब भी कहीं दबी सी है

  • मेरे जाने के बाद वो भी मुझे छुप-छुप कर देखती तो है,थोड़ी ही सही पर वो मोहब्बत करती तो है।

    मेरे जाने के बाद वो भी मुझे छुप-छुप कर देखती तो है,
    थोड़ी ही सही पर वो मोहब्बत करती तो है।

    मेरे जाने के बाद वो भी मुझे छुप-छुप कर देखती तो है,
    थोड़ी ही सही पर वो मोहब्बत करती तो है।

    इतनी मोहब्बत कम तो नहीं।
    वो इस तरह तो बोलती बहुत है,

    महफिलों में खिलखिलाती भी बहुत है,
    पर जब भी हो हम से आंखें चार,

    खुदा कसम वो शर्माती बहुत है।
    इतनी मोहब्बत कम तो नहीं।

  • देखा तो तुझे जब पहली बार मैंने,अपनी आंखों पर न किया था एतबार मैंने,

    देखा तो तुझे जब पहली बार मैंने,
    अपनी आंखों पर न किया था एतबार मैंने,

    देखा तो तुझे जब पहली बार मैंने,
    अपनी आंखों पर न किया था एतबार मैंने,

    क्या होता है कोई इतना भी खूबसूरत,
    यही पूछा था खुदा से बार-बार मैंने।

    तेरे नीले नीले नैनो ने किया था काला जादू मुझ पर,
    यूं ही तो नहीं खो दिया था करार मैंने।

  • दायम पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूं मैंख़ाक ऐसी ज़िन्दगी पे कि पत्थर नहीं हूं मैं

    दायम पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूं मैं
    ख़ाक ऐसी ज़िन्दगी पे कि पत्थर नहीं हूं मैं

    दायम पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूं मैं
    ख़ाक ऐसी ज़िन्दगी पे कि पत्थर नहीं हूं मैं

    कयों गरदिश-ए-मुदाम से घबरा न जाये दिल
    इनसान हूं पयाला-ओ-साग़र नहीं हूं मैं

    या रब ! ज़माना मुझको मिटाता है किस लिये
    लौह-ए-जहां पे हरफ़-ए-मुकररर नहीं हूं मैं

    हद चाहिये सज़ा में उकूबत के वासते
    आख़िर गुनहगार हूं, काफ़िर नहीं हूं मैं

    किस वासते अज़ीज़ नहीं जानते मुझे ?
    लालो-ज़मुररुदो-ज़र-ओ-गौहर नहीं हूं मैं

    रखते हो तुम कदम मेरी आंखों में कयों दरेग़
    रुतबे में मेहर-ओ-माह से कमतर नहीं हूं मैं

    करते हो मुझको मनअ-ए-कदम-बोस किस लिये
    क्या आसमान के भी बराबर नहीं हूं मैं

    ‘ग़ालिब’ वज़ीफ़ाख़वार हो, दो शाह को दुआ
    वो दिन गये कि कहते थे, “नौकर नहीं हूं मैं”

  • ख़ुदा हमको ऐसी खुदाई न देकि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे

    ख़ुदा हमको ऐसी खुदाई न दे
    कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे

    ख़ुदा हमको ऐसी खुदाई न दे
    कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे

    ख़तावार समझेगी दुनिया तुझे
    अब इतनी ज्यादा सफाई न दे

    हंसो आज इतना कि इस शोर में
    सदा सिसकियों की सुनाई न दे

    अभी तो बदन में लहू है बहुत
    कलम छीन ले रोशनाई न दे

    ख़ुदा ऐसे अहसास का नाम है
    रहे सामने और दिखाई न दे