अपनी मंज़िल का रास्ता भेजो

अपनी मंज़िल का रास्ता भेजो 

जान हम को वहाँ बुला भेजो 

क्या हमारा नहीं रहा सावन 

ज़ुल्फ़ याँ भी कोई घटा भेजो 

नई कलियाँ जो अब खिली हैं वहाँ 

उन की ख़ुश्बू को इक ज़रा भेजो 

हम न जीते हैं और न मरते हैं 

दर्द भेजो न तुम दवा भेजो 

धूल उड़ती है जो उस आँगन में 

उस को भेजो सबा सबा भेजो

ऐ फकीरो गली के उस गुल की 

तुम हमें अपनी ख़ाक-ए-पा भेजो 

शफ़क़-ए-शाम-ए-हिज्र के हाथों 

अपनी उतरी हुई क़बा भेजो 

कुछ तो रिश्ता है तुम से कम-बख़्तों 

कुछ नहीं कोई बद-दुआ’ भेजो

  • जौन एलिया

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *