क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़ | मिर्ज़ा ग़ालिब

क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़

क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़ | मिर्ज़ा ग़ालिब

क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़

क्या नहीं है मुझे ईमान अज़ीज़

 

दिल से निकला पे निकला दिल से

है तिरे तीर का पैकान अज़ीज़

 

ताब लाए ही बनेगी ‘ग़ालिब’

वाक़िआ सख़्त है और जान अज़ीज़

क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़ | मिर्ज़ा ग़ालिब

AahaT sī koī aa.e to lagtā hai ki tum ho

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