Tag: मिर्ज़ा ग़ालिब

  • रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की | मिर्ज़ा ग़ालिब

    रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की | मिर्ज़ा ग़ालिब

    रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की | मिर्ज़ा ग़ालिब

    रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की

    इतराए क्यूँ ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की

    जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह

    लोगों में क्यूँ नुमूद हो लाला-ज़ार की

    भूके नहीं हैं सैर-ए-गुलिस्ताँ के हम वले

    क्यूँकर खाइए कि हवा है बहार की

    रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • काबे में जा रहा तो न दो ता’ना क्या कहें | मिर्ज़ा ग़ालिब

    काबे में जा रहा तो न दो ता’ना क्या कहें | मिर्ज़ा ग़ालिब

    काबे में जा रहा तो न दो ता’ना क्या कहें | मिर्ज़ा ग़ालिब

    काबे में जा रहा तो दो ता’ना क्या कहें

    भूला हूँ हक़्क़-ए-सोहबत-ए-अहल-ए-कुनिश्त को

    ताअ’त में ता रहे मय-ओ-अंगबीं की लाग

    दोज़ख़ में डाल दो कोई ले कर बहिश्त को

    हूँ मुन्हरिफ़ क्यूँ रह-ओ-रस्म-ए-सवाब से

    टेढ़ा लगा है क़त क़लम-ए-सरनविश्त को

    ‘ग़ालिब’ कुछ अपनी सई से लहना नहीं मुझे

    ख़िर्मन जले अगर मलख़ खाए किश्त को

    काबे में जा रहा तो न दो ता’ना क्या कहें | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • फिर इस अंदाज़ से बहार आई | मिर्ज़ा ग़ालिब

    फिर इस अंदाज़ से बहार आई | मिर्ज़ा ग़ालिब

    फिर इस अंदाज़ से बहार आई | मिर्ज़ा ग़ालिब

    फिर इस अंदाज़ से बहार आई

    कि हुए मेहर-ओ-मह तमाशाई

    देखो साकिनान-ए-ख़ित्ता-ए-ख़ाक

    इस को कहते हैं आलम-आराई

    कि ज़मीं हो गई है सर-ता-सर

    रू-कश-ए-सतह-ए-चर्ख़-ए-मीनाई

    सब्ज़ा को जब कहीं जगह मिली

    बन गया रू-ए-आब पर काई

    सब्ज़ा गुल के देखने के लिए

    चश्म-ए-नर्गिस को दी है बीनाई

    है हवा में शराब की तासीर

    बादा-नोशी है बादा-पैमाई

    क्यूँ दुनिया को हो ख़ुशी ‘ग़ालिब’

    शाह-ए-दीं-दार ने शिफ़ा पाई

    फिर इस अंदाज़ से बहार आई | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • नहीं कि मुझ को क़यामत का ए’तिक़ाद नहीं | मिर्ज़ा ग़ालिब

    नहीं कि मुझ को क़यामत का ए’तिक़ाद नहीं | मिर्ज़ा ग़ालिब

    नहीं कि मुझ को क़यामत का ए’तिक़ाद नहीं | मिर्ज़ा ग़ालिब

    नहीं कि मुझ को क़यामत का ए’तिक़ाद नहीं

    शब-ए-फ़िराक़ से रोज़-ए-जज़ा ज़ियाद नहीं

    कोई कहे कि शब-ए-मह में क्या बुराई है

    बला से आज अगर दिन को अब्र बाद नहीं

    जो आऊँ सामने उन के तो मर्हबा कहें

    जो जाऊँ वाँ से कहीं को तो ख़ैर-बाद नहीं

    कभी जो याद भी आता हूँ मैं तो कहते हैं

    कि आज बज़्म में कुछ फ़ित्ना-ओ-फ़साद नहीं

    अलावा ईद के मिलती है और दिन भी शराब

    गदा-ए-कूच-ए-मय-ख़ाना ना-मुराद नहीं

    जहाँ में हो ग़म-ओ-शादी बहम हमें क्या काम

    दिया है हम को ख़ुदा ने वो दिल कि शाद नहीं

    तुम उन के वा’दे का ज़िक्र उन से क्यूँ करो ‘ग़ालिब’

    ये क्या कि तुम कहो और वो कहें कि याद नहीं

     

    नहीं कि मुझ को क़यामत का ए’तिक़ाद नहीं | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • बहुत सही ग़म-ए-गीती शराब कम क्या है | मिर्ज़ा ग़ालिब

    बहुत सही ग़म-ए-गीती शराब कम क्या है | मिर्ज़ा ग़ालिब

    बहुत सही ग़म-ए-गीती शराब कम क्या है | मिर्ज़ा ग़ालिब

    बहुत सही ग़म-ए-गीती शराब कम क्या है

    ग़ुलाम-ए-साक़ी-ए-कौसर हूँ मुझ को ग़म क्या है

    तुम्हारी तर्ज़-ओ-रविश जानते हैं हम क्या है

    रक़ीब पर है अगर लुत्फ़ तो सितम क्या है

    सुख़न में ख़ामा-ए-ग़ालिब की आतिश-अफ़्शानी

    यक़ीं है हम को भी लेकिन अब उस में दम क्या है

    कटे तो शब कहें काटे तो साँप कहलावे

    कोई बताओ कि वो ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म क्या है

    लिखा करे कोई अहकाम-ए-ताला-ए-मौलूद

    किसे ख़बर है कि वाँ जुम्बिश-ए-क़लम क्या है

    हश्र-ओ-नश्र का क़ाएल केश मिल्लत का

    ख़ुदा के वास्ते ऐसे की फिर क़सम क्या है

    वो दाद-ओ-दीद गराँ-माया शर्त है हमदम

    वगर्ना मेहर-ए-सुलेमान-ओ-जाम-ए-जम क्या है

    बहुत सही ग़म-ए-गीती शराब कम क्या है | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़ | मिर्ज़ा ग़ालिब

    क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़ | मिर्ज़ा ग़ालिब

    क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़ | मिर्ज़ा ग़ालिब

    क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़

    क्या नहीं है मुझे ईमान अज़ीज़

     

    दिल से निकला पे निकला दिल से

    है तिरे तीर का पैकान अज़ीज़

     

    ताब लाए ही बनेगी ‘ग़ालिब’

    वाक़िआ सख़्त है और जान अज़ीज़

    क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़ | मिर्ज़ा ग़ालिब

    AahaT sī koī aa.e to lagtā hai ki tum ho