Category: Shayar

प्रकृति की खूबसूरती पर टॉप 10 शायरी  1. हरी-भरी वादियों का समा प्यारा लगता है, ठंडी हवाओं का हर झोंका न्यारा लगता है। जब भी देखूं मैं कुदरत की इस रंगीन तस्वीर, हर कोना मुझे किसी सपने जैसा लगता है।

प्रकृति की खूबसूरती पर टॉप 10 शायरी 

प्रकृति की खूबसूरती पर टॉप 10 शायरी 1.हरी-भरी वादियों का समा प्यारा लगता है,ठंडी हवाओं का हर झोंका न्यारा लगता है।जब भी देखूं मैं कुदरत की इस रंगीन तस्वीर,हर कोना मुझे किसी सपने जैसा...

मिर्ज़ा ग़ालिब का जीवन और विरासत एक व्यापक परिचय

मिर्ज़ा ग़ालिब का जीवन और विरासत एक व्यापक परिचय

मिर्ज़ा ग़ालिब का जीवन और विरासत: एक व्यापक परिचय मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू और फ़ारसी साहित्य के सबसे महान शायरों में से एक थे। उनकी शायरी में गहरी भावनाएँ, जीवन के दर्शन और प्रेम की...

ज़िंदगी के एहसास नए दौर की शायरी

ज़िंदगी के एहसास नए दौर की शायरी

ज़िंदगी के एहसास नए दौर की शायरी जब अल्फ़ाज़ दिल की गहराइयों से निकलते हैं, तो शायरी बन जाती है! शायरी सिर्फ़ शब्दों का खेल नहीं, यह दिल के एहसासों की कहानी होती है।...

शाहरयार की टॉप शेर

शाहरयार की टॉप शेर: इस शायरी की गहरी दुनिया में खो जाइए

इस ब्लॉग में, हम आपको शाहरयार की 20 बेहद दिलचस्प शेर प्रस्तुत कर रहे हैं, जो इश्क, उम्मीद, और जीवन की गहराइयों को छूने का प्रयास करते हैं। शाहरयार की शायरी में उनकी संवेदनाओं...

allama

अल्लामा इक़बाल की 20 शेरों की टॉप शायरी

1. “ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले, ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है.” इस शेर में अल्लामा इकबाल ने ख़ुदी के महत्व को बताया है, और...

सीमाब-पुश्त गर्मी-ए-आईना दे है हम

सीमाब-पुश्त गर्मी-ए-आईना दे है हम | Mirza Ghalib

सीमाब-पुश्त गर्मी-ए-आईना दे है हम | Mirza Ghalib सीमाब-पुश्त गर्मी-ए-आईना दे है हम हैराँ किए हुए हैं दिल-ए-बे-क़रार के आग़ोश-ए-गुल कुशूदा बरा-ए-विदा है ऐ अंदलीब चल कि चले दिन बहार के यूँ बाद-ए-ज़ब्त-ए-अश्क फिरूँ...

रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की

रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की | मिर्ज़ा ग़ालिब

रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की | मिर्ज़ा ग़ालिब रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की इतराए क्यूँ न ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह लोगों में क्यूँ नुमूद न हो लाला-ज़ार...

काबे में जा रहा तो न दो ता'ना क्या कहें

काबे में जा रहा तो न दो ता’ना क्या कहें | मिर्ज़ा ग़ालिब

काबे में जा रहा तो न दो ता’ना क्या कहें | मिर्ज़ा ग़ालिब काबे में जा रहा तो न दो ता’ना क्या कहें भूला हूँ हक़्क़-ए-सोहबत-ए-अहल-ए-कुनिश्त को ताअ’त में ता रहे न मय-ओ-अंगबीं की...

फिर इस अंदाज़ से बहार आई

फिर इस अंदाज़ से बहार आई | मिर्ज़ा ग़ालिब

फिर इस अंदाज़ से बहार आई | मिर्ज़ा ग़ालिब फिर इस अंदाज़ से बहार आई कि हुए मेहर-ओ-मह तमाशाई देखो ऐ साकिनान-ए-ख़ित्ता-ए-ख़ाक इस को कहते हैं आलम-आराई कि ज़मीं हो गई है सर-ता-सर रू-कश-ए-सतह-ए-चर्ख़-ए-मीनाई...