बहुत अजीब है तुम्हारी|
तुम वो गैर थे, जिसने मैंने,
पल भर में अपना माना था|


टूट कर चाहना, और फिर टूट जाना.
बात छोटी सी है मगर जान,
निकल जाती है
मुझे जिंदगी का इतना तजुर्बा तो नहीं,
पर सुना है सादगी में लोग जीने नहीं देते

तूने तो रुला कर रख दिया ए जिंदगी,
जा कर पूछ मेरी मां से कितने लाडले थे हम,
न जाने क्यों आज अपना घर मुझे अनजान सा लगता है,
तेरे जाने के बाद मां |
यह घर, घर नहीं बस मकान लगता है

चरासाजो की चरसाजी से
दर्द बदनाम तो नहीं होगा?
हाँ! दवा दो, मगर ये बतलादो,
मुझे आराम तो नहीं होगा?

तेरा वहां है कि मैंने भुला दिया तुझे
पर मेरी एक सांस ऐसी नहीं
जो तेरा नाम ना ले |

रफ्तार जिंदगी की कुछ यू बनाए रखें
के दुश्मन आगे निकल जाए
पर दोस्त कोई पिछे ना छूटे
छोड़ दो अब उससे वफा की उम्मीद गालिब
जो रुला सकता है वह भुला भी सकता है
मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले

आस होगी न आसरा होगा
आने वाले दिनों में क्या होगा
मैं तुझे भूल जाऊँगा इक दिन
वक़्त सब कुछ बदल चुका होगा
नाम हम ने लिखा था आँखों में
आँसुओं ने मिटा दिया होगा
आसमाँ भर गया परिंदों से
पेड़ कोई हरा गिरा होगा
कितना दुश्वार था सफ़र उस का
वो सर-ए-शाम सो गया होगा