तुम पूछ लेना सुबह से,
न यकीन हो तो शाम से
ये दिल धड़कता है
तेरे ही नाम से।
Author: admin
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तू चाँद मैं सितारा होता
तू चाँद मैं सितारा होता,
आसमान में एक आशिया हमारा होता।
लोग तुझे दूर से देखा करते और
सिर्फ पास रहने का हक हमारा होता। -

कोई ग़ज़ल सुना कर क्या करना
कोई ग़ज़ल सुना कर क्या करना,
यूँ बात बढ़ा कर क्या करना।
तुम मेरे थे, तुम मेरे हो,
दुनिया को बता कर क्या करना।
तुम साथ निभाओ चाहत से,
कोई रस्म निभा कर क्या करना।
तुम खफ़ा भी अच्छे लगते हो,
फिर तुमको मना कर क्या करना। -

ज़िन्दगी के सफ़र में
ज़िन्दगी के सफ़र में आपका सहारा चाहिए
आपके चरणों का बस आसरा चाहिए
हर मुश्किलों का हँसते हुए सामना करेंगे
बस ठाकुर जी आपका एक इशारा चाहिए -

तेरी बातों का असर
तेरी बातों का असर
जो छाया है मेरे दिल पर
यक़ीनन मुझे तड़पाएगा
अब ये रात भर
सोचा भूल जाऊंगा तुझे
अब करूँगा ना याद
मगर दर्द ही मिला मुझे,
तुझे भूल कर -

हर एक बात पे कहते हो
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है
न शो’ले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा
कोई बताओ कि वो शोख़-ए-तुंद-ख़ू क्या है
ये रश्क है कि वो होता है हम-सुख़न तुम से
वगर्ना ख़ौफ़-ए-बद-आमोज़ी-ए-अदू क्या है
चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारे जैब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
वो चीज़ जिस के लिए हम को हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाए बादा-ए-गुलफ़ाम-ए-मुश्क-बू क्या है
पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो-चार
ये शीशा ओ क़दह ओ कूज़ा ओ सुबू क्या है
रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
तो किस उमीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है
हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता
वगर्ना शहर में ‘ग़ालिब’ की आबरू क्या है
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मोम के पास कभी आग को लेकर देखूं
मोम के पास कभी आग को लेकर देखूं
सोचता हूँ के तुझे हाथ लगाकर देखूंमैंने देखा है ज़माने को शराब पीकर
दम निकल जाए अगर होश में आकर देखूंदिल का मंदिर बड़ा वीरान नज़र आता है
सोचता हूँ तेरी तस्वीर लगा कर देखूंतेरे बारे में सुना है ये कि तू सूरज है
मैं जरा देर तेरे साये में आकर देखूंयाद आता है के पहले भी कर बार यूँ ही
मैंने सोचा था के तुझे भुलाकर देखूं -

बड़ी मुश्किल से बना हूँ
बड़ी मुश्किल से बना हूँ,
टूट जाने के बाद |
मै आज भी रो देता हु,
अक्सर मुस्कराने के बाद -

मैंने कब कहा कि, वह मिल जाए मुझे?
मैंने कब कहा कि,
वह मिल जाए मुझे?
कहीं वो गैर ना हो जाए,
बस इतनी सी हसरत है |
उन रिश्तो को भी निभाया है मैंने,
जिनमें न मिलना,
सबसे पहले सर्त थी |

