एक से हो गए मौसम हो, कि चेहरे सारे

एक से हो गए मौसम हो, कि चेहरे सारे
मेरी आँखों से कहीं खो गया मंजर मेरा

किससे पूंछू कि कहाँ गुम हूँ कई बरसों से
हर जगह ढूंढता फिरता है मुझे घर मेरा

मुद्दतें हो गई इक ख्वाब सुनहरा देखे
जागता रहता है हर नींद में बिस्तर मेरा

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