Allama Iqbal Shayari | गर्म-ए-फ़ुग़ाँ है जरस उठ कि गया क़ाफ़िला

गर्म-ए-फ़ुग़ाँ   है   जरस    उठ कि   गया     क़ाफ़िला वाए  वो  रह-रौ  कि  है मुंतज़़िर-ए-राहिला तेरी  तबीअत  है  और  तेरा ज़माना  है  और तेरे   मुआफ़िक़   नहीं ख़ानक़ही…

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