Tag: ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद

  • ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद | मिर्ज़ा ग़ालिब

    ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद | मिर्ज़ा ग़ालिब

    ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद | मिर्ज़ा ग़ालिब

    ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद

    वगर्ना हम तो तवक़्क़ो ज़ियादा रखते हैं

     

    तन-ए-ब-बंद-ए-हवस दर नदादा रखते हैं

    दिल-ए-ज़-कार-ए-जहाँ ऊफ़्तादा रखते है

     

    तमीज़-ए-ज़िश्ती-ओ-नेकी में लाख बातें हैं

    ब-अक्स-ए-आइना यक-फ़र्द-ए-सादा रखते हैं

     

    ब-रंग-ए-साया हमें बंदगी में है तस्लीम

    कि दाग़-ए-दिल ब-जाबीन-ए-कुशादा रखते हैं

     

    ब-ज़ाहिदाँ रग-ए-गर्दन है रिश्ता-ए-ज़ुन्नार

    सर-ए-ब-पा-ए-बुत-ए-ना-निहादा रखते हैं

     

    मुआफ़-ए-बे-हुदा-गोई हैं नासेहान-ए-अज़ीज़

    दिल-ए-ब-दस्त-ए-निगारे नदादा रखते हैं

     

    ब-रंग-ए-सब्ज़ा अज़ीज़ान-ए-बद-ज़बान यक-दस्त

    हज़ार तेग़-ए-ब-ज़हर-आब-दादा रखते हैं

     

    अदब ने सौंपी हमें सुर्मा-साइ-ए-हैरत

    ज़बान-ए-बस्ता-ओ-चश्म-ए-कुशादा रखते हैं

     

    ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद | मिर्ज़ा ग़ालिब