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आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे | मिर्ज़ा ग़ालिब आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे   हसरत ने ला रखा तिरी बज़्म-ए-ख़याल में गुल-दस्ता-ए-निगाह सुवैदा कहें ज...

धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव

धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव | मिर्ज़ा ग़ालिब धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव रखता है ज़िद से खींच के बाहर लगन के पाँव   दी सादगी से जान पड़ूँ कोहकन के पाँव हैहात क्यूँ न टूट...

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे | मिर्ज़ा ग़ालिब   आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे   हसरत ने ला रखा तिरी बज़्म-ए-ख़याल में गुल-दस्ता-ए-निगाह सुवैदा...

लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले

लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले | मिर्ज़ा ग़ालिब   लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले ‘ग़ालिब’ ये ख़ौफ़ है कि कहाँ से अदा करूँ   ख़ुश वहशते कि अर्ज़-ए-...

ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद

ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद | मिर्ज़ा ग़ालिब ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद वगर्ना हम तो तवक़्क़ो ज़ियादा रखते हैं   तन-ए-ब-बंद-ए-हवस दर नदादा रखते हैं दिल-ए-ज़-कार-ए-जहाँ ऊफ़्तादा र...

फ़ारिग़ मुझे न जान कि मानिंद-ए-सुब्ह-ओ-मेहर

फ़ारिग़ मुझे न जान कि मानिंद-ए-सुब्ह-ओ-मेहर | मिर्ज़ा ग़ालिब   फ़ारिग़ मुझे न जान कि मानिंद-ए-सुब्ह-ओ-मेहर है दाग़-ए-इश्क़ ज़ीनत-ए-जेब-ए-कफ़न हुनूज़   है नाज़-ए-मुफ़्लिसाँ ज़र-ए-अज़-दस्त-रफ़्त...

अपने दीवार-ओ-दर से पूछते हैं

अपने दीवार-ओ-दर से पूछते हैं | राहत इंदौरी अपने दीवार-ओ-दर से पूछते हैं घर के हालात घर से पूछते हैं क्यूँ अकेले हैं क़ाफ़िले वाले एक इक हम-सफ़र से पूछते हैं क्या कभी ज़िंदगी भी देखेंगे बस यही उम्र-भर ...

जो ये हर-सू फ़लक मंज़र खड़े हैं

जो ये हर-सू फ़लक मंज़र खड़े हैं | राहत इन्दोरी जो ये हर-सू फ़लक मंज़र खड़े हैं न जाने किस के पैरों पर खड़े हैं तुला है धूप बरसाने पे सूरज शजर भी छतरियाँ ले कर खड़े हैं उन्हें नामों से मैं पहचानता हूँ ...

सियाही जैसे गिर जाए दम-ए-तहरीर काग़ज़ पर

सियाही जैसे गिर जाए दम-ए-तहरीर काग़ज़ पर | मिर्ज़ा ग़ालिब जुनूँ तोहमत-कश-ए-तस्कीं न हो गर शादमानी की नमक-पाश-ए-ख़राश-ए-दिल है लज़्ज़त ज़िंदगानी की कशाकश-हा-ए-हस्ती से करे क्या सई-ए-आज़ादी हुइ ज़ंजीर-ए...

है वस्ल हिज्र आलम-ए-तमकीन-ओ-ज़ब्त में

है वस्ल हिज्र आलम-ए-तमकीन-ओ-ज़ब्त में | मिर्ज़ा ग़ालिब है वस्ल हिज्र आलम-ए-तमकीन-ओ-ज़ब्त में माशूक़-ए-शोख़ ओ आशिक़-ए-दीवाना चाहिए उस लब से मिल ही जाएगा बोसा कभी तो हाँ शौक़-ए-फ़ुज़ूल ओ जुरअत-ए-रिंदाना च...