Category: Shayari

सच्ची मोहब्बत शायरी

प्यार पर शेर – Love Shayari

इश्क़, उर्दू कविता में सबसे लोकप्रिय विषयों में से एक है। इश्क़ पर सबसे प्रसिद्ध शेरों की सूची तैयार है। इनका चयन प्रसिद्धता और प्रत्येक शेर की गुणवत्ता के आधार पर किया गया है।...

ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स

ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स | मिर्ज़ा ग़ालिब

ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स | मिर्ज़ा ग़ालिब ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स बर्क़ से करते हैं रौशन शम्-ए-मातम-ख़ाना हम   महफ़िलें बरहम करे है गंजिंफ़ा-बाज़-ए-ख़याल हैं वरक़-गर्दानी-ए-नैरंग-ए-यक-बुत-ख़ाना...

दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना

दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना | मिर्ज़ा ग़ालिब

दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना | मिर्ज़ा ग़ालिब दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना बारे अपनी बेकसी की हम ने पाई दाद याँ   हैं...

रफ़्तार-ए-उम्र क़त-ए-रह-ए-इज़्तिराब है

रफ़्तार-ए-उम्र क़त-ए-रह-ए-इज़्तिराब है | मिर्ज़ा ग़ालिब

रफ़्तार-ए-उम्र क़त-ए-रह-ए-इज़्तिराब है | मिर्ज़ा ग़ालिब रफ़्तार-ए-उम्र क़त-ए-रह-ए-इज़्तिराब है इस साल के हिसाब को बर्क़ आफ़्ताब है   मीना-ए-मय है सर्व नशात-ए-बहार से बाल-ए-तदरौ जल्वा-ए-मौज-ए-शराब है   ज़ख़्मी हुआ है पाश्ना पा-ए-सबात का ने...

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे | मिर्ज़ा ग़ालिब

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे | मिर्ज़ा ग़ालिब आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे   हसरत ने ला रखा तिरी...

धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव

धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव | मिर्ज़ा ग़ालिब

धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव | मिर्ज़ा ग़ालिब धोता हूँ जब मैं पीने को उस सीम-तन के पाँव रखता है ज़िद से खींच के बाहर लगन के पाँव  ...

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे | मिर्ज़ा ग़ालिब

आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे | मिर्ज़ा ग़ालिब   आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे   हसरत ने ला रखा...

लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले

लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले | मिर्ज़ा ग़ालिब

लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले | मिर्ज़ा ग़ालिब   लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक-ख़्वाब-ए-खुश वले ‘ग़ालिब’ ये ख़ौफ़ है कि कहाँ से अदा करूँ   ख़ुश वहशते कि अर्ज़-ए-जुनून-ए-फ़ना करूँ जूँ गर्द-ए-राह जामा-ए-हस्ती...