Category: Mirza Ghalib

  • है वस्ल हिज्र आलम-ए-तमकीन-ओ-ज़ब्त में | मिर्ज़ा ग़ालिब

    है वस्ल हिज्र आलम-ए-तमकीन-ओ-ज़ब्त में | मिर्ज़ा ग़ालिब

    है वस्ल हिज्र आलम-ए-तमकीन-ओ-ज़ब्त में | मिर्ज़ा ग़ालिब

    है वस्ल हिज्र आलम-ए-तमकीन-ओ-ज़ब्त में

    माशूक़-ए-शोख़ आशिक़-ए-दीवाना चाहिए

    उस लब से मिल ही जाएगा बोसा कभी तो हाँ

    शौक़-ए-फ़ुज़ूल जुरअत-ए-रिंदाना चाहिए

    आशिक़ नाक़ाब-ए-जल्वा-ए-जानाना चाहिए

    फ़ानूस-ए-शम्अ’ को पर-ए-परवाना चाहिए

    है वस्ल हिज्र आलम-ए-तमकीन-ओ-ज़ब्त में | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • गुलशन में बंदोबस्त ब-रंग-ए-दिगर है आज | मिर्ज़ा ग़ालिब

    गुलशन में बंदोबस्त ब-रंग-ए-दिगर है आज | मिर्ज़ा ग़ालिब

    गुलशन में बंदोबस्त ब-रंग-ए-दिगर है आज | मिर्ज़ा ग़ालिब

    गुलशन में बंदोबस्त ब-रंग-ए-दिगर है आज

    क़ुमरी का तौक़ हल्क़ा-ए-बैरून-ए-दर है आज

    आता है एक पारा-ए-दिल हर फ़ुग़ाँ के साथ

    तार-ए-नफ़स कमंद-ए-शिकार-ए-असर है आज

    आफ़ियत किनारा कर इंतिज़ाम चल

    सैलाब-ए-गिर्या दरपय-ए-दीवार-ओ-दर है आज

    माज़ूली-ए-तपिश हुई इफ़रात-ए-इंतिज़ार

    चश्म-ए-कुशादा हल्क़ा-ए-बैरून-ए-दर है आज

    हैरत-फ़रोश-ए-सद-निगरानी है इज़्तिरार

    सर-रिश्ता चाक-ए-जेब का तार-ए-नज़र है आज

    हूँ दाग़-ए-नीम-रंगी-ए-शाम-ए-विसाल-ए-यार

    नूर-ए-चराग़-ए-बज़्म से जोश-ए-सहर है आज

    करती है आजिज़ी-ए-सफ़र सोख़्तन तमाम

    पैराहन-ए-ख़सक में ग़ुबार-ए-शरर है आज

    ता-सुब्ह है ब-मंज़िल-ए-मक़्सद रसीदनी

    दूद-ए-चराग़-ए-ख़ाना ग़ुबार-ए-सफ़र है आज

    दूर-ऊफ़्तादा-ए-चमन-ए-फ़िक्र है ‘असद’

    मुर्ग़-ए-ख़याल बुलबुल-ए-बे-बाल-ओ-पर है आज

    गुलशन में बंदोबस्त ब-रंग-ए-दिगर है आज | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • ख़मोशियों में तमाशा अदा निकलती है | मिर्ज़ा ग़ालिब

    ख़मोशियों में तमाशा अदा निकलती है | मिर्ज़ा ग़ालिब

    ख़मोशियों में तमाशा अदा निकलती है | मिर्ज़ा ग़ालिब

    ख़मोशियों में तमाशा अदा निकलती है

    निगाह दिल से तिरे सुर्मा-सा निकलती है

    फ़शार-ए-तंगी-ए-ख़ल्वत से बनती है शबनम

    सबा जो ग़ुंचे के पर्दे में जा निकलती है

    पूछ सीना-ए-आशिक़ से आब-ए-तेग़-ए-निगाह

    कि ज़ख्म-ए-रौज़न-ए-दर से हवा निकलती है

    ब-रंग-ए-शीशा हूँ यक-गोश-ए-दिल-ए-ख़ाली

    कभी परी मिरी ख़ल्वत में निकलती है

    ख़मोशियों में तमाशा अदा निकलती है | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • ख़मोशियों में तमाशा अदा निकलती है | मिर्ज़ा ग़ालिब

    ख़मोशियों में तमाशा अदा निकलती है | मिर्ज़ा ग़ालिब

    ख़मोशियों में तमाशा अदा निकलती है | मिर्ज़ा ग़ालिब

    ख़मोशियों में तमाशा अदा निकलती है

    निगाह दिल से तिरे सुर्मा-सा निकलती है

    फ़शार-ए-तंगी-ए-ख़ल्वत से बनती है शबनम

    सबा जो ग़ुंचे के पर्दे में जा निकलती है

    पूछ सीना-ए-आशिक़ से आब-ए-तेग़-ए-निगाह

    कि ज़ख्म-ए-रौज़न-ए-दर से हवा निकलती है

    ब-रंग-ए-शीशा हूँ यक-गोश-ए-दिल-ए-ख़ाली

    कभी परी मिरी ख़ल्वत में निकलती है

    ख़मोशियों में तमाशा अदा निकलती है | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • हो गई है ग़ैर की शीरीं-बयानी कारगर | मिर्ज़ा ग़ालिब

    हो गई है ग़ैर की शीरीं-बयानी कारगर | मिर्ज़ा ग़ालिब

    हो गई है ग़ैर की शीरीं-बयानी कारगर | मिर्ज़ा ग़ालिब

    हो गई है ग़ैर की शीरीं-बयानी कारगर

    इश्क़ का उस को गुमाँ हम बे-ज़बानों पर नहीं

    ज़ब्त से मतलब ब-जुज़ वारस्तगी दीगर नहीं

    दामन-ए-तिमसाल आब-ए-आइना से तर नहीं

    बाइस-ए-ईज़ा है बरहम-ख़ुर्दन-ए-बज़्म-ए-सुरूर

    लख़्त लख़्त-ए-शीशा-ए-ब-शिकास्ता जुज़ निश्तर नहीं

    दिल को इज़्हार-ए-सुख़न अंदाज़-ए-फ़तह-उल-बाब है

    याँ सरीर-ए-ख़ामा ग़ैर-अज़-इस्तिकाक-ए-दर नहीं

    हो गई है ग़ैर की शीरीं-बयानी कारगर | मिर्ज़ा ग़ालिब

  • मिरी हस्ती फ़ज़ा-ए-हैरत आबाद-ए-तमन्ना है | Mirza Ghalib

    मिरी हस्ती फ़ज़ा-ए-हैरत आबाद-ए-तमन्ना है | Mirza Ghalib

    मिरी हस्ती फ़ज़ा-ए-हैरत आबाद-ए-तमन्ना है | Mirza Ghalib

    मिरी हस्ती फ़ज़ा-ए-हैरत आबाद-ए-तमन्ना है

    जिसे कहते हैं नाला वो उसी आलम का अन्क़ा है

    ख़िज़ाँ क्या फ़स्ल-ए-गुल कहते हैं किस को कोई मौसम हो

    वही हम हैं क़फ़स है और मातम बाल-ओ-पर का है

    वफ़ा-ए-दिलबराँ है इत्तिफ़ाक़ी वर्ना हमदम

    असर फ़रियाद-ए-दिल-हा-ए-हज़ीं का किस ने देखा है

    लाई शोख़ी-ए-अंदेशा ताब-ए-रंज-ए-नौमीदी

    कफ़-ए-अफ़्सोस मिलना अहद-ए-तज्दीद-ए-तमन्ना है

    सोवे आबलों में गर सरिश्क-ए-दीदा-ए-नाम से

    ब-जौलाँ-गाह-ए-नौमीदी निगाह-ए-आजिज़ाँ पा

    ब-सख़्ती-हा-ए-क़ैद-ए-ज़िंदगी मालूम आज़ादी

    शरर भी सैद-ए-दाम-ए-रिश्ता-ए-रग-हा-ए-ख़ारा है

    तग़फ़ुल-मशरबी से ना-तमामी बस-कि पैदा है

    निगाह-ए-नाज़ चश्म-ए-यार में ज़ुन्नार-ए-मीना है

    तसर्रुफ़ वहशियों में है तसव्वुर-हा-ए-मजनूँ का

    सवाद-ए-चश्म-ए-आहू अक्स-ए-ख़ाल-ए-रू-ए-लैला है

    मोहब्बत तर्ज़-ए-पैवंद-ए-निहाल-ए-दोस्ती जाने

    दवीदन रेशा साँ मुफ़्त-ए-रग-ए-ख़्वाब-ए-ज़ुलेख़ा है

    किया यक-सर गुदाज़-ए-दिल नियाज़-ए-जोशिश-ए-हसरत

    सुवैदा नुस्ख़ा-ए-तह-बंदी-ए-दाग़-ए-तमन्ना है

    हुजूम-ए-रेज़िश-ए-ख़ूँ के सबब रंग उड़ नहीं सकता

    हिना-ए-पंजा-ए-सैय्याद मुर्ग़-ए-रिश्ता बर-पा है

    असर सोज़-ए-मोहब्बत का क़यामत बे-मुहाबा है

    कि रग से संग में तुख़्म-ए-शरर का रेशा पैदा है

    निहाँ है गौहर-ए-मक़्सूद जेब-ए-ख़ुद-शनासी में

    कि याँ ग़व्वास है तिमसाल और आईना दरिया है

    अज़ीज़ो ज़िक्र-ए-वस्ल-ए-ग़ैर से मुझ को बहलाओ

    कि याँ अफ़्सून-ए-ख़्वाब अफ़्साना-ए-ख़्वाब-ए-ज़ुलेख़ा है

    तसव्वुर बहर-ए-तस्कीन-ए-तपीदन-हा-ए-तिफ़्ल-ए-दिल

    ब-बाग़-ए-रंग-हा-ए-रफ़्ता गुल-चीन-ए-तमाशा है

    ब-सइ-ए-ग़ैर है क़त-ए-लिबास-ए-ख़ाना-वीरानी

    कि नाज़-ए-जादा-ए-रह रिश्ता-ए-दामान-ए-सहरा है

    मिरी हस्ती फ़ज़ा-ए-हैरत आबाद-ए-तमन्ना है | Mirza Ghalib

  • लब-ए-ख़ुश्क दर-तिश्नगी-मुर्दगाँ का | Mirza Ghalib

    लब-ए-ख़ुश्क दर-तिश्नगी-मुर्दगाँ का | Mirza Ghalib

    लब-ए-ख़ुश्क दर-तिश्नगी-मुर्दगाँ का | Mirza Ghalib

    लब-ए-ख़ुश्क दर-तिश्नगी-मुर्दगाँ का

    ज़ियारत-कदा हूँ दिल-आज़ुर्दगाँ का

    हमा ना-उमीदी हमा बद-गुमानी

    मैं दिल हूँ फ़रेब-ए-वफ़ा-ख़ुर्दगाँ का

    शगुफ़्तन कमीं-गाह-ए-तक़रीब-जूई

    तसव्वुर हूँ बे-मोजिब आज़ुर्दगाँ का

    ग़रीब-ए-सितम-दीदा-ए-बाज़-गश्तन

    सुख़न हूँ सुख़न बर लब-आवुर्दगाँ का

    सरापा यक-आईना-दार-ए-शिकस्तन

    इरादा हूँ यक-आलम-अफ़्सुर्दगाँ का

    ब-सूरत तकल्लुफ़ ब-मअ’नी तअस्सुफ़

    ‘असद’ मैं तबस्सुम हूँ पज़मुर्दगाँ का

    लब-ए-ख़ुश्क दर-तिश्नगी-मुर्दगाँ का | Mirza Ghalib

  • बुलाती है मगर जाने का नइं | राहत इंदौरी

    बुलाती है मगर जाने का नइं | राहत इंदौरी

    बुलाती है मगर जाने का नइं | राहत इंदौरी

    बुलाती है मगर जाने का नइं

    वो दुनिया है उधर जाने का नइं

    सितारे नोच कर ले जाऊँगा

    मैं ख़ाली हाथ घर जाने का नइं

    मिरे बेटे किसी से इश्क़ कर

    मगर हद से गुज़र जाने का नइं

    वो गर्दन नापता है नाप ले

    मगर ज़ालिम से डर जाने का नइं

    वबा फैली हुई है हर तरफ़

    अभी माहौल मर जाने का नइं

    बुलाती है मगर जाने का नइं | राहत इंदौरी

  • nashsha-ha shadab-e-rang o saz-ha mast-e-tarab | Mirza Ghalib

    nashsha-ha shadab-e-rang o saz-ha mast-e-tarab | Mirza Ghalib

    nashsha-ha shadab-e-rang o saz-ha mast-e-tarab | Mirza Ghalib

    nashsha-hā shādāb-e-rañg o sāz-hā mast-e-tarab

    shīsha-e-mai sarv-e-sabz-e-jū-e-bār-e-naġhma hai

    ham-nashīñ mat kah ki barham kar na bazm-e-aish-e-dost

    vaañ to mere naale ko bhī e’tibār-e-naġhma hai

    nashsha-ha shadab-e-rang o saz-ha mast-e-tarab | Mirza Ghalib

  • सफ़ा-ए-हैरत-ए-आईना है सामान-ए-ज़ंग आख़िर | Mirza Ghalib

    सफ़ा-ए-हैरत-ए-आईना है सामान-ए-ज़ंग आख़िर | Mirza Ghalib

    सफ़ा-ए-हैरत-ए-आईना है सामान-ए-ज़ंग आख़िर | Mirza Ghalib

    सफ़ा-ए-हैरत-ए-आईना है सामान-ए-ज़ंग आख़िर

    तग़य्युर आब-ए-बर-जा-मांदा का पाता है रंग आख़िर

    की सामान-ए-ऐश-ओ-जाह ने तदबीर वहशत की

    हुआ जाम-ए-ज़मुर्रद भी मुझे दाग़-ए-पलंग आख़िर

    ख़त-ए-नौ-ख़ेज़ नील-ए-चश्म ज़ख़्म-ए-साफ़ी-ए-आरिज़

    लिया आईना ने हिर्ज़-ए-पर-ए-तूती ब-चंग आख़िर

    हिलाल-आसा तही रह गर कुशादन-हा-ए-दिल चाहे

    हुआ मह कसरत-ए-सरमाया-अंदाेज़ी से तंग आख़ि

    तड़प कर मर गया वो सैद-ए-बाल-अफ़्शाँ कि मुज़्तर था

    हुआ नासूर-ए-चश्म-ए-ताज़ियत चश्म-ए-ख़दंग आख़िर

    लिखी यारों की बद-मस्ती ने मयख़ाने की पामाली

    हुइ क़तरा-फ़िशानी-हा-ए-मय-बारान-ए-संग आख़िर

    ‘असद’ पर्दे में भी आहंग-ए-शौक़-ए-यार क़ाएम है

    नहीं है नग़्मे से ख़ाली ख़मीदन-हा-ए-चंग आख़िर

    सफ़ा-ए-हैरत-ए-आईना है सामान-ए-ज़ंग आख़िर | Mirza Ghalib