Category: ज़िन्दगी

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  • कोई ख़ुशी पाने के लिए रोता है

    कोई ख़ुशी पाने के लिए रोता है

    कोई ख़ुशी पाने के लिए रोता है
    कोई दुःख की पनाह में रोता है
    अजीब सी होती है ना जिंदगी 
    कोई भरोसा दिलाने के लिए रोता है| 
    कोई भरोसा करके रोता है|

  • शाम सूरज को ढलना सिखाती है

    शाम सूरज को ढलना सिखाती है

    शाम सूरज को ढलना सिखाती है
    शमां परवाने को जलना
    गिरने पर चोट तो जरूर लगती है
    लेकिन ठोकर ही इंसान को चलना सिखाती है |

  • सच्ची मोहब्बत तो दिल से होती है

    सच्ची मोहब्बत तो दिल से होती है

    सच्ची मोहब्बत तो दिल से होती है
    सच्चे रिश्ते भी दिल से होते है
    जरुरत के लिए बने रिश्ते
    अक्सर टूट जाया करते है |

  • मंजिल तक वही जाते है  जिनके पास हुनर होता है

    मंजिल तक वही जाते है जिनके पास हुनर होता है

    मंजिल तक वही जाते है
    जिनके पास हुनर होता है
    सिर्फ पंखो से कुछ नहीं होता
    उड़ान हौसले से होती है |

  • हमें कहा मालूम था कि मोहब्बत क्या होती है

    हमें कहा मालूम था कि मोहब्बत क्या होती है

    हमें कहा मालूम था कि मोहब्बत क्या होती है |
    हमें कहा एहसास था कि दुनिया कैसी है |
    फिर तुम आये तो दुनिया खूबसूरत हो गयी
    और जिंदगी इश्क़ बन गयी |

  • ज़िन्दगी के सफर में , कोई हमसफ़र ना मिला

    ज़िन्दगी के सफर में , कोई हमसफ़र ना मिला

    ज़िन्दगी के सफर में , कोई हमसफ़र ना मिला

    हम किसी को ना मिले , और कोई हमे ना मिला 

  • अनकही सी कुछ बातें , लम्हों में समां जाती हैं

    अनकही सी कुछ बातें , लम्हों में समां जाती हैं

    अनकही सी कुछ बातें , लम्हों में समां जाती हैं
    यादों के समंदर में , अपना आशियाना बनाती है

    मीलों के फास्लो में , कुछ ठहराव वो लाती है
    ग़मो की घरी में वह वक़्त को भुलाती है

    जीने की दौड़ भाग में , वो सुकून लाती है
    ज़िन्दगी थम सी जाये , वो एहसास दिलाती है

    अनकहिं सी कुछ बातें , लम्हों में समां जाती हैं
    यादों के समादर में , अपना आशियाना बनाती है

    मैं बेपरवाह चलता रहा , मंज़िल की राह में
    फुर्सत के कुछ पल वो , तोहफे में दे जाती है

    सफर -इ -ज़ीस्त की तलाश में , राहों में भटकते हुए
    चलते रहने का वो हौसला दे जाती है

    अनकहिं सी कुछ बातें , लम्हों में समां जाती हैं
    यादों के समंदर में , अपना आशियाना बनाती है

    बीतें लम्हों के कुछ पल वो सामने लाती है
    जीतने की वो , कशिश पैदा कर जाती है

    हर एक हार में . वो सबक सिखाती है
    बढ़ते रहने की हिम्मत , वो मुझमे लाती है

    अनकहिं सी कुछ बातें , लम्हों में समां जाती हैं
    यादों के समंदर में , अपना आशियाना बनती है

    वक़्त की तेज़ रफ़्तार में वो , दौड़ना सिखाती है
    हर एक राह में वो शाइस्तगी लाती है

    यूँ मायूस होकर न बैठ इरफ़ान , ज़िन्दगी अभी बाकी है
    गिरते हुए हर लम्हे में वो , जीत की झलक दिखाती है

    अनकहिं सी कुछ बातें , लम्हों में समां जाती हैं
    यादों के समंदर में , अपना आशियाना बनती है |

  • ज़रा तिरछी पड़ने लगी है किरन अब

    ज़रा तिरछी पड़ने लगी है किरन अब

    ज़रा तिरछी पड़ने लगी है किरन अब
    ज़रा सर्दियाँ सब्ज़ पत्तों में उतरीं
    ज़रा पड़ रही हैं कहीं और ही अब
    जवाँ हुस्न की बुल्हवस वो निगाहें
    तसव्वुर वो माज़ी का धुँधला हुआ कुछ
    न गलियों में अब हैं वो बेबाक फेरे
    उन्हीं दिलजलों के जिनके सरों में

    अजब एक सौदा था रुसवाइयों का
    वो ख़ामोश नज़रों में पूरा फ़साना
    वही आमदो-रफ़्त ख़्वाबों का शब में
    वही जागना और कभी सो भी जाना

    वो तनहा सा कमरा ,
    धड़कते हुएदो जवाँ साल दिल और
    वो रह रह के इक ख़ौफ़ सा दस्तकों का
    ये लम्हों का भी था अजब एक सैलाब
    जो चुनते हुए सख्त़ बाँहों में अपनी
    सभी नर्मियों को उठा ले गया यूँ
    पता आईने को भी ये चल न पाया
    इन्ही तंग गलियो की वीरानियों में

    न जाने कहाँ से
    उभरने लगे कितने मक़रूह चेहरे
    फ़सुर्दा से चेहरे,थके-हारे चेहरे
    इन्हें देखने की कहाँ,कब थी फ़ुर्सत
    ये तब भी वहीं थे ,ये अब भी वहीं है
    बिना कोई आहट, बिना कोई हलचल
    ख़मोशी से कोई तवक़्क़ो लगाए हुए
    ज़िंदगी से

    के शायद इन्हें ज़िन्दगी अपने दामन से
    दो-चार मुरझाए पल ही सही
    दे के अपनी सख़ावत पे कुछ नाज़ कर ले
    लताफ़त से इनको भला क्या है लेना
    तमीज़ इनको क्या हुस्न की वुसअतों की
    इन्हें ख़्वाब की पुरकशिश वादियों से
    भला क्या है मतलब

    वजूद इनका है कुछ तो है सिर्फ़ इतना
    के सारे मनाज़िर को गढ़ते रहें ये
    नज़र पर न आएँ
    मगर आज
    मगर आज जब
    वक़्त का एक ख़ामोश सैलाब
    चुनते हुए सख्त़ बाँहों में अपनी
    सभी नर्मियों को उठा ले गया यूँ
    मगर आज

    जब ताब मद्धम हुई बेकराँ इस नज़र की
    बहुत साफ़ आने लगे हैं नज़र
    कितने मुब्हम से चेहरे
    के जो कितनी सदियों से
    क़ुर्बान होते रहे लम्हा लम्हा
    के कोई समेटे उनकी सारी लताफ़त
    उनको वहशी बना दे
    कोई आए और ज़र्फ़ उनका उठा ले
    उनको कमज़र्फ़ कर दे
    कोई उनके लाग़र बदन सेनोच ले

    जो हैं कपड़े
    बरहना उनको कर दे
    कोई आए और रहनुमा उनका बनके
    ग़र्क़ दरिया में कर दे
    के जब आज
    इस ज़िन्दगी के बदन से
    धूप की सारी किरनें
    चंद लम्हों में हैं ढलनेवाली

    न जाने भला क्यूँ
    बहुत साफ़ आने लगे हैं नज़र ये
    गुमशुदा कितने चेहरे
    के हो वक़्ते-आख़िर
    उसी वक़्त जैसे अचानक
    माशूक़ की इक जवाँ याद आए..

  • आप खुद नही जानते आप कितने प्यारे हो…

    आप खुद नही जानते आप कितने प्यारे हो…

    आप खुद नही जानते आप कितने प्यारे हो…

    जान तो हमारी पर जान से प्यारे हो…..

    दूर होने से कोई फर्क नही पड़ता….

    आप कल भी हमारे थे आज भी हमारे हो..

  • मेरी यादो मे तुम हो

    मेरी यादो मे तुम हो

    मेरी यादो मे तुम हो, या मुझ मे ही तुम हो,
    मेरे खयालो मे तुम हो, या मेरा खयाल ही तुम हो,
    दिल मेरा धडक पूछे, बार बार एक ही बात,
    मेरी जान मे तुम हो, या मेरी जान ही तुम हो!!!