Author: admin

बुलाती है मगर जाने का नइं

बुलाती है मगर जाने का नइं | राहत इंदौरी

बुलाती है मगर जाने का नइं | राहत इंदौरी बुलाती है मगर जाने का नइं वो दुनिया है उधर जाने का नइं सितारे नोच कर ले जाऊँगा मैं ख़ाली हाथ घर जाने का नइं...

nashsha-ha shadab-e-rang o saz-ha mast-e-tarab

nashsha-ha shadab-e-rang o saz-ha mast-e-tarab | Mirza Ghalib

nashsha-ha shadab-e-rang o saz-ha mast-e-tarab | Mirza Ghalib nashsha-hā shādāb-e-rañg o sāz-hā mast-e-tarab shīsha-e-mai sarv-e-sabz-e-jū-e-bār-e-naġhma hai ham-nashīñ mat kah ki barham kar na bazm-e-aish-e-dost vaañ to mere naale ko bhī e’tibār-e-naġhma hai nashsha-ha shadab-e-rang...

सीमाब-पुश्त गर्मी-ए-आईना दे है हम

सीमाब-पुश्त गर्मी-ए-आईना दे है हम | Mirza Ghalib

सीमाब-पुश्त गर्मी-ए-आईना दे है हम | Mirza Ghalib सीमाब-पुश्त गर्मी-ए-आईना दे है हम हैराँ किए हुए हैं दिल-ए-बे-क़रार के आग़ोश-ए-गुल कुशूदा बरा-ए-विदा है ऐ अंदलीब चल कि चले दिन बहार के यूँ बाद-ए-ज़ब्त-ए-अश्क फिरूँ...

सफ़ा-ए-हैरत-ए-आईना है सामान-ए-ज़ंग आख़िर

सफ़ा-ए-हैरत-ए-आईना है सामान-ए-ज़ंग आख़िर | Mirza Ghalib

सफ़ा-ए-हैरत-ए-आईना है सामान-ए-ज़ंग आख़िर | Mirza Ghalib सफ़ा-ए-हैरत-ए-आईना है सामान-ए-ज़ंग आख़िर तग़य्युर आब-ए-बर-जा-मांदा का पाता है रंग आख़िर न की सामान-ए-ऐश-ओ-जाह ने तदबीर वहशत की हुआ जाम-ए-ज़मुर्रद भी मुझे दाग़-ए-पलंग आख़िर ख़त-ए-नौ-ख़ेज़ नील-ए-चश्म ज़ख़्म-ए-साफ़ी-ए-आरिज़...

रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की

रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की | मिर्ज़ा ग़ालिब

रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की | मिर्ज़ा ग़ालिब रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की इतराए क्यूँ न ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह लोगों में क्यूँ नुमूद न हो लाला-ज़ार...

काबे में जा रहा तो न दो ता'ना क्या कहें

काबे में जा रहा तो न दो ता’ना क्या कहें | मिर्ज़ा ग़ालिब

काबे में जा रहा तो न दो ता’ना क्या कहें | मिर्ज़ा ग़ालिब काबे में जा रहा तो न दो ता’ना क्या कहें भूला हूँ हक़्क़-ए-सोहबत-ए-अहल-ए-कुनिश्त को ताअ’त में ता रहे न मय-ओ-अंगबीं की...

फिर इस अंदाज़ से बहार आई

फिर इस अंदाज़ से बहार आई | मिर्ज़ा ग़ालिब

फिर इस अंदाज़ से बहार आई | मिर्ज़ा ग़ालिब फिर इस अंदाज़ से बहार आई कि हुए मेहर-ओ-मह तमाशाई देखो ऐ साकिनान-ए-ख़ित्ता-ए-ख़ाक इस को कहते हैं आलम-आराई कि ज़मीं हो गई है सर-ता-सर रू-कश-ए-सतह-ए-चर्ख़-ए-मीनाई...

नहीं कि मुझ को क़यामत का ए'तिक़ाद नहीं

नहीं कि मुझ को क़यामत का ए’तिक़ाद नहीं | मिर्ज़ा ग़ालिब

नहीं कि मुझ को क़यामत का ए’तिक़ाद नहीं | मिर्ज़ा ग़ालिब नहीं कि मुझ को क़यामत का ए’तिक़ाद नहीं शब-ए-फ़िराक़ से रोज़-ए-जज़ा ज़ियाद नहीं कोई कहे कि शब-ए-मह में क्या बुराई है बला से...